सरकारी अस्पतालों में मरीज बीमारी का इलाज कराने आते हैं, लेकिन यहां उन्हें संक्रमण का खतरा भी मिल रहा है। जयपुर, सीकर और श्रीगंगानगर के एक दर्जन से ज्यादा अस्पतालों के पानी की जांच में कहीं सीवेज से जुड़े बैक्टीरिया मिले, तो कहीं नाइट्रेट की मात्रा तय सीमा से 6 गुना तक ज्यादा मिली। श्रीगंगानगर के रावला मंडी सीएचसी के पानी में 100 एमएल में 460 बैक्टीरिया मिले, वहीं सीकर के जनाना अस्पताल के पानी में नाइट्रेट 45 की तय सीमा के मुकाबले 290 मिलीग्राम प्रति लीटर मिला। सवाल यह है कि अस्पतालों में पानी की जांच, टंकियों की सफाई और प्यूरीफायर की निगरानी का जिम्मा संभालने वाला सिस्टम आखिर कर क्या रहा है? भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि अस्पतालों में ट्यूबवेल का पानी टंकियों में स्टोर किया जाता है। कई जगह टंकियों की सफाई की तारीख तक दर्ज नहीं मिली, जबकि कुछ अस्पतालों में प्यूरीफायर खराब पड़े थे। दूषित पानी से पेट और आंतों के संक्रमण का खतरा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अस्पताल में आने वाले मरीज पहले से अस्वस्थ होते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है। ऐसे में कॉलीफार्म बैक्टीरिया युक्त पानी का सेवन उनके लिए खतरनाक हो सकता है। एसके अस्पताल: रोज 5 हजार मरीज, प्यूरीफायर खराब पड़ा शेखावाटी के सबसे बड़े एसके अस्पताल के पानी के सैंपल में 100 एमएल में 23 से ज्यादा कॉलीफार्म बैक्टीरिया मिले। यहां नाइट्रेट की मात्रा भी 140 मिलीग्राम प्रति लीटर मिली, जबकि निर्धारित सीमा 45 मिलीग्राम है। टंकी के पास लगा वाटर प्यूरीफायर खराब पड़ा है। अस्पताल में हर दिन 5 हजार से ज्यादा मरीज आते हैं। सीकर के जनाना अस्पताल के पानी में नाइट्रेट 290 मिलीग्राम प्रति लीटर मिला। यह तय सीमा से छह गुना से भी ज्यादा है। लक्ष्मणगढ़ जिला अस्पताल के पानी में 100 एमएल में 43 बैक्टीरिया और श्रीमाधोपुर सीएचसी के पानी में 9 बैक्टीरिया मिले। जयपुर जिले के अस्पतालों में नाइट्रेट ज्यादा मिला जयपुर जिले के चौमूं राजकीय उप जिला अस्पताल के पानी में नाइट्रेट 80 मिलीग्राम प्रति लीटर और गोविंदगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के पानी में 109 मिलीग्राम प्रति लीटर मिला। दोनों जगह यह निर्धारित 45 मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा से अधिक है। हालांकि, जयपुर जिले के जांचे गए अस्पतालों के सैंपल में बैक्टीरिया नहीं मिले। रावला मंडी अस्पताल : श्रीगंगानगर जिले के रावला मंडी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के पानी के सैंपल में 100 एमएल में 460 बैक्टीरिया मिले। टंकी के पास गंदगी थी और यहीं से मरीजों के लिए पानी भरा जाता है। अस्पताल में प्यूरीफायर की समुचित व्यवस्था नहीं मिली। इतनी बड़ी संख्या में बैक्टीरिया मिलने से पानी की गुणवत्ता और उसके रखरखाव की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते हैं। टंकियों की सफाई की तारीख दर्ज नहीं : अस्पतालों में ट्यूबवेल का पानी टंकियों में स्टोर किया जाता है। पड़ताल में टंकियों की सफाई की तारीख दर्ज नहीं मिली और कुछ जगह प्यूरीफायर खराब पाए गए। ऐसे में सवाल है कि टंकियों की नियमित सफाई कौन सुनिश्चित करता है और पानी की गुणवत्ता की निगरानी कितनी नियमित होती है? सभी अस्पतालों से रिपोर्ट मंगवाकर लापरवाही की जांच कराएंगे। -नरोत्तम शर्मा, एडिशनल डायरेक्टर, अस्पताल प्रशासन पानी की गुणवत्ता में गड़बड़ी की सूचना मिलने पर जांच कराएंगे। - डॉ. अशोक महरिया, सीएमएचओ, सीकर अस्पतालों में आरओ लगे हैं। जहां कॉलीफार्म ज्यादा मिलते हैं, वहां ब्लीचिंग पाउडर से बैक्टीरिया नियंत्रित किए जाते हैं। -डॉ. अजय सिंगला, सीएमएचओ, श्रीगंगानगर