फ्रांस में हैकर्स ने 1 नवंबर की रात ब्लड बैंक के कोल्ड स्टोरेज सिस्टम पर हमला किया। हमलावरों ने फ्रीजर का तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से बढ़ाकर 110 डिग्री सेल्सियस तक करने की कोशिश की। हालांकि, अलार्म सिस्टम ने समय रहते गड़बड़ी पकड़ ली। इससे खून और प्लाज्मा के नमूनों को कोई नुकसान नहीं हुआ। फ्रांस के साप्ताहिक अखबार 'ले कनार आंचेने' ने बुधवार को सबसे पहले इस साइबर हमले की खबर दी थी। इसके बाद मामले का खुलासा हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक ब्लड स्टोरेज सिस्टम में प्रवेश के लिए डिफॉल्ट पासवर्ड का इस्तेमाल किया गया था। डिफॉल्ट पासवर्ड (पहले से तय पासवर्ड) वह पासवर्ड होता है, जो किसी मशीन, डिवाइस या सॉफ्टवेयर में कंपनी की तरफ से पहले से सेट करके दिया जाता है। अगर मशीन लगाने के बाद उसका पासवर्ड नहीं बदला गया, तो हैकर उसी पुराने पासवर्ड से सिस्टम में घुसने की कोशिश कर सकते हैं। प्लाजमा को सुरक्षित जगह भेजा गया फ्रांस के ब्लड बैंक का संचालन करने वाली संस्था फ्रेंच ब्लड एस्टैब्लिशमेंट (EFS) के मुताबिक फ्रीजर में रखे प्लाज्मा को सुरक्षित दूसरी जगह भेज दिया गया है। EFS ने बताया कि कोल्ड स्टोरेज में लगे निगरानी और अलार्म सिस्टम ने तापमान में असामान्य बदलाव को तुरंत पकड़ लिया। इससे कर्मचारियों को समय रहते कार्रवाई करने का मौका मिल गया। इंटरनेट से जुड़े फ्रीजर कंट्रोल सिस्टम में सेंध लगाई फ्रीजर का तापमान नियंत्रित करने के लिए दुकानों और कोल्ड स्टोरेज सेंटर में खास इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोलर लगे होते हैं। इनकी मदद से तापमान की निगरानी और उसे दूर से नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ सिस्टम इंटरनेट से जुड़े होते हैं, ताकि उपकरण उपलब्ध कराने वाली कंपनी या तकनीकी कर्मचारी कहीं से भी उनकी जांच और मरम्मत कर सकें। फ्रांस की सरकारी साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-FR ने 12 अक्टूबर को ही रेफ्रिजरेशन कंट्रोलर पर हमलों को लेकर चेतावनी जारी की थी। एजेंसी के मुताबिक, इन उपकरणों के कई कंट्रोलर इंटरनेट पर सीधे उपलब्ध थे। कुछ में पुराने सॉफ्टवेयर और डिफॉल्ट पासवर्ड जैसी सुरक्षा संबंधी कमजोरियां थीं। यूरोप में फ्रीजर हैकिंग के 2 मामले यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब यूरोप के कई देशों में सुपरमार्केट के फ्रीजर सिस्टम को भी निशाना बनाया जा रहा है। इन हमलों में हैकर्स ने रेफ्रिजरेशन सिस्टम का तापमान बढ़ा दिया, जिससे बड़ी मात्रा में खाने-पीने का सामान खराब हो गया। पहला हमला: 11 अक्टूबर दूसरा हमला: 1 नवंबर रूस पर हमले का शक यूरोप में हुए इन साइबर हमलों के पीछे किसका हाथ है, यह अभी साफ नहीं हुआ है। हालांकि, रूस समर्थित हैकर समूहों की भूमिका को लेकर शक जताया जा रहा है। आयरलैंड की न्यूज वेबसाइट RTE की 5 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस समर्थक दो हैकर समूहों नोनेम057(16) और जेड-पेंटेस्ट अलायंस ने डैनफॉस कंपनी की तकनीक को हैक करने का दावा किया था। डैनफॉस रेफ्रिजरेशन सिस्टम और तापमान नियंत्रित करने वाले उपकरण बनाती है। हैकर समूहों के दावे से इन हमलों में उनकी संभावित भूमिका को लेकर सवाल उठे हैं। हालांकि, अभी तक इस बात की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है कि फ्रांस के सुपरमार्केट और ब्लड बैंक पर हुए हमलों के पीछे यही समूह थे। यूरोपीय जांच एजेंसियों ने भी किसी देश या संगठन को इन हमलों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि अलग-अलग देशों में हुए हमले एक ही अभियान का हिस्सा थे या इनके पीछे अलग-अलग हैकर समूह काम कर रहे थे।