इंदौर में खजूरी बाजार निवासी सतीश दवे और कविता दवे के 25 वर्षीय बेटे गौरव को 13 जुलाई को अचानक ब्रेन हेमरेज हुआ। उन्हें राजश्री अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने इलाज किया, लेकिन गौरव की हालत नहीं सुधरी। निर्धारित प्रक्रिया के तहत दो बार मेडिकल चेकअप के बाद स्पेशलिस्ट टीम ने गौरव को रविवार रात ब्रेन डेड घोषित कर दिया। जवान बेटे को खोने के दर्द के बीच ही दवे परिवार ने ऐसा फैसला लिया, जिसने कई लोगों की जिंदगी में नई उम्मीद जगा दी। परिवार की सहमति से गौरव का हार्ट, लिवर, किडनियां और आंखें दान की गई हैं। इसके लिए सोमवार को इंदौर में 68वां ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। परिवार के इकलौते बेटे गौरव फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग डायरेक्टर का काम करते थे। वे एक्टर भी बनना चाहते थे। पिता सतीश दवे सरकारी नौकरी से रिटायर्ड हैं। मां गृहिणी हैं। छोटी बहन वैदेही की शादी हो चुकी है। बहन, बहनोई और भाई ने की बातचीत; माता-पिता ने रजामंदी दी ब्रेन डेथ की पुष्टि होने के बाद गौरव की बहन वैदेही राठी, बहनोई पल्केश राठी और भाई रितिक चावरे ने माता-पिता को संभाला। उनसे गौरव के अंग दान करने को लेकर बातचीत की। माता-पिता ने इसके लिए सहमति दे दी। अंगदान की प्रक्रिया में मुस्कान पारमार्थिक ट्रस्ट के सेवादार जीतू बगानी, संदीपन आर्य और लकी खत्री ने दवे परिवार का सहयोग किया। आर्य ने बताया कि डॉक्टरों ने परिवार को ब्रेन डेथ और अंगदान के बारे में समझाया। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू की गई। लिवर-किडनी, आंखें इंदौर में प्रत्यारोपित; हार्ट अहमदाबाद भेजा सोमवार सुबह गौरव का लिवर राजश्री अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती 42 वर्षीय मरीज को प्रत्यारोपित किया गया। हार्ट ग्रीन कॉरिडोर के माध्यम से अहमदाबाद स्थित यूएन मेहता हॉस्पिटल भेजा गया, जहां 28 वर्षीय युवक को लगाया जाएगा। उनकी दोनों किडनियां चोइथराम हॉस्पिटल में भर्ती 22 और 52 वर्ष की दो महिला मरीजों को प्रत्यारोपित की गईं जबकि आंखें शंकरा आई बैंक के माध्यम से दान की गईं। बड़ा अभिनेता बनना चाहते थे, असली हीरो बन गए गौरव के साथ फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाली ड्रीम वर्ल्ड मूवीज एंड प्रोडक्शन की एचओडी महक राज ने कहा- करीब 4 साल पहले बी.कॉम करने के बाद गौरव इंडस्ट्री से जुड़ गए थे। इंदौर में रहकर ही काम करते थे। वे अपनी मेहनत, ईमानदारी और मिलनसार स्वभाव के कारण सभी के प्रिय थे। उन्होंने कहा कि आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन जाते-जाते कई लोगों को नई जिंदगी देकर वे सच्चे मायनों में हीरो बन गए। विश्व में अब तक 8 ही लोगों को हुई ये बीमारी महक ने कहा- गौरव को बचपन से ही ब्रेन की बीमारी मोया-मोया थी, जो विश्व में अब तक सिर्फ 8 और भारत में तीन ही लोगों को हुई है। उन्हें 13 जुलाई को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यहां दो दिन बाद ब्रेन सर्जरी की गई, दो स्टेंट डाले गए थे। इसके बाद गौरव को आईसीयू से वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। लेकिन अगले दिन ही फिर उनकी हालत बिगड़ी तो उन्हें वेंटिलेटर पर लिया गया। इसके बाद वे होश में नहीं आए। वहीं, मुस्कान पारमार्थिक ट्रस्ट के संदीपन आर्य ने कहा- दवे परिवार ने अपने व्यक्तिगत दुख से ऊपर उठकर जो निर्णय लिया, वह समाज के लिए प्रेरणास्रोत है। ये खबर भी पढ़ें… अब मेडिकल कॉलेजों में भी होंगे ब्रेन-डेड मरीज के अंगदान मध्य प्रदेश के सभी ट्रॉमा सेंटर और मेडिकल कॉलेजों में ब्रेन-डेड मरीजों के अंग दान करने की व्यवस्था होगी। साथ ही ब्रेन डेड मरीज के परिवारों से अंगदान की मंजूरी के लिए जरूरी काउंसलिंग के लिए स्थायी काउंसलर की नियुक्ति भी की जाएगी। पढ़ें पूरी खबर…