झुंझुनूं के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) हिमांशु सिंह ने स्पीच थैरेपी के जरिए अपने बोलने में अटकने की समस्या को कम किया है। इसके साथ ही वे स्पीच थैरेपी शुरू कर ऐसे बच्चों को भी मोटिवेट कर रहे हैं। 6 साल की उम्र से उन्हें यह समस्या थी। करीब 23 साल की उम्र में स्पीच थेरेपी शुरू करने और नियमित अभ्यास से उन्हें बोलने में सुधार मिला। अब वे अपने अनुभव के जरिए हकलाहट से परेशान बच्चों की मदद करने का प्रयास कर रहे हैं। हिमांशु सिंह बताते हैं ऐसे बच्चों को धैर्य से सुनना और बिना टोके अपनी बात पूरी करने का मौका देना जरूरी है। परिवार, शिक्षक और सहपाठियों का सहयोग बच्चों की झिझक कम करने में मदद कर सकता है। जवाब पता होने के बावजूद वे अटकने के डर से चुप रह सकते हैं। यदि दूसरे बच्चे उनका मजाक उड़ाएं या उन्हें बार-बार टोका जाए, तो यह झिझक और बढ़ सकती है। ऐसे में शिक्षकों की भूमिका अहम है। बच्चों को पर्याप्त समय देना, उनकी बात ध्यान से सुनना और पूरी कक्षा में सम्मानजनक माहौल बनाए रखना जरूरी है। हकलाहट के कारण किसी बच्चे की समझ या योग्यता का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।