क्षेत्र में शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया गया। पिपलिया कलां में घर-घर खीर बनी। पुराने, आरोग्यवर्धक लोक-रिवाज फिर जीवंत हुए। मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात बनी खीर को खुले आसमान के नीचे छत पर रखा। खीर पर चंद्रमा की किरणें पड़ीं। शरद ऋतु की शीतलता का असर रहा। सनातन संस्कृति, आयुर्वेद के मुताबिक शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। उसकी किरणों में अमृत जैसे गुण माने जाते हैं। रात्रिभर चांदनी में रखने के बाद खीर को अगले दिन सुबह परिवार के सदस्यों ने प्रसाद रूप में ग्रहण किया। प्रबुद्धजन, बुजुर्ग मानते हैं कि चंद्र किरणों से ओत-प्रोत खीर खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। पित्त, कफ दोषों का शमन होता है। परंपरा निभाने को लेकर स्थानीय लोगों में उत्साह दिखा। महिलाओं ने विधि-विधान से पकवान तैयार किए। रात में सामूहिक रूप से परंपरा का निर्वहन किया। शरद पूर्णिमा का पर्व धार्मिक आस्था, पारंपरिक संस्कृति, उत्तम स्वास्थ्य की कामना के साथ हुआ।