दीपावली से पहले सरकारी स्कूलों के सौंदर्यीकरण और दीपोत्सव के लिए माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत 22 अक्टूबर से स्कूलों की सफाई और सौंदर्यीकरण, 3 नवंबर तक कचरा हटाने तथा 6 नवंबर से दीयों और लाइटिंग से सजावट करने को कहा गया है। रंग-रोगन, मरम्मत और सजावट के लिए बजट देने के बजाय जनसहयोग और श्रमदान का सहारा लेने के निर्देश हैं। ऐसे में बिना वित्तीय सहायता स्कूलों को चमकाने की जिम्मेदारी संस्था प्रधानों पर आ गई है। अभियान के तहत ‘कबाड़ हटाओ, श्रमदान लाओ’ पहल में टूटे-फूटे फर्नीचर की नीलामी और ग्रामीणों, विद्यार्थियों व सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से स्कूलों को सजाने की योजना है। लेकिन खासकर आदिवासी अंचलों में जनसहयोग से यह काम कराना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। एसएफजी ग्रांट से कर सकेंगे खर्च: सीडीईओ मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी वीरेन्द्र यादव ने बताया कि अभियान के लिए एसएफजी (स्कूल फैसिलिटी ग्रांट) का उपयोग किया जा सकेगा। हालांकि, उपलब्ध नियमों के अनुसार इस ग्रांट से स्कूल भवन की बड़ी मरम्मत, पुताई, उत्सव और सजावट जैसे कामों पर खर्च नहीं किया जा सकता। यह राशि शिक्षण सामग्री, पेयजल व्यवस्था, पंखे-ट्यूबलाइट की मरम्मत, बिजली बिल, खेल गतिविधियों और उपकरणों की छोटी-मोटी मरम्मत जैसे निर्धारित कार्यों के लिए है। ऐसे में सवाल है कि जब ग्रांट से पुताई और सजावट नहीं हो सकती, तो इन कामों के लिए राशि कहां से आएगी। शिक्षक संघ ने की बजट की मांग राजस्थान पंचायती राज एवं माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष शेर सिंह चौहान ने कहा कि विद्यालय सौंदर्यीकरण एवं दीपोत्सव-2026 अभियान की अवधारणा अच्छी है, लेकिन सरकार को इसके लिए समय पर उचित बजट भी जारी करना चाहिए। खासकर आदिवासी क्षेत्रों में जनसहयोग से ऐसे काम कराना व्यावहारिक नहीं है। वित्तीय सहायता के बिना शिक्षकों से इसकी अपेक्षा करना अव्यावहारिक है। विभाग एक ओर स्कूलों को आकर्षक बनाने के निर्देश दे रहा है, वहीं शौचालयों की मरम्मत के लिए भी पुरानी कंपोजिट ग्रांट पर निर्भर रहने की स्थिति है। ऐसे में बजट के अभाव में अभियान को जमीन पर उतारना चुनौतीपूर्ण होगा।