हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के ट्रांसफर आदेशों को चुनौती देने वाली बड़ी संख्या में याचिकाओं पर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे प्रशासनिक मशीनरी का कामकाज प्रभावित हो रहा है। किसी भी कर्मचारी को अपनी पसंद की जगह पर तैनात रहने का अधिकार नहीं है। ट्रांसफर सरकारी सेवा का अनिवार्य हिस्सा है और प्रशासनिक आवश्यकता व जनहित में कर्मचारी को कहां तैनात किया जाए, यह नियोक्ता या सक्षम अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में है। जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने मनोज कुमार व अन्य की याचिकाओं का निस्तारण करते हुए प्रार्थियों को दो सप्ताह में संबंधित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष विस्तृत अभ्यावेदन पेश करने को कहा। सक्षम प्राधिकारी को इसके बाद दो सप्ताह में कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। अदालत ने कहा कि इस दौरान चार सप्ताह तक संबंधित ट्रांसफर आदेश प्रभावी नहीं किए जाएंगे। यदि प्रार्थियों के अभ्यावेदन खारिज होते हैं तो विभाग कानून के अनुसार ट्रांसफर आदेश लागू कर सकेगा। इसके बावजूद कोई कर्मचारी नई जगह कार्यग्रहण नहीं करता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकेगी। ट्रांसफर आदेशों के खिलाफ याचिकाओं की बाढ़, प्रशासनिक कामकाज अटके अदालत ने कहा कि ट्रांसफर आदेशों को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं की बाढ़ आई हुई है। अधिकांश मामलों में कर्मचारी ट्रांसफर की गई जगह पर कार्यभार संभालने के इच्छुक नहीं होते और अदालत की शरण लेते हैं। इससे सरकारी कामकाज प्रभावित होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक आवश्यकता, जनहित और सुचारू प्रशासन के लिए कर्मचारियों की तैनाती तय करना सक्षम अधिकारी का अधिकार है। किसी कर्मचारी को लंबे समय तक एक ही स्थान पर बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।