रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों और रेलकर्मियों को मिलने वाला पेयजल सुरक्षित रहे, इसके लिए कोटा मंडल के विभिन्न स्टेशनों पर पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच की जा रही है। 28 सितंबर से 22 अक्टूबर 2026 तक अवशिष्ट क्लोरीन के 1,819 परीक्षण किए गए। इनमें 1,817 सफल रहे, जबकि 2 परीक्षण सफल नहीं हुए। वहीं, बैक्टीरियोलॉजिकल जांच के लिए लिए गए सभी 114 नमूने निर्धारित मानकों के अनुरूप पाए गए। रेलवे जल स्रोतों से लेकर जलापूर्ति व्यवस्था तक की निगरानी कर रहा है, ताकि पानी की गुणवत्ता में कमी मिलने पर समय रहते सुधार किया जा सके। वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक सौरभ जैन ने बताया कि यात्रियों और रेलकर्मियों को स्वच्छ एवं सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना रेलवे की प्राथमिकता है। इसी उद्देश्य से पानी में अवशिष्ट क्लोरीन की जांच और बैक्टीरियोलॉजिकल परीक्षण कराए जा रहे हैं। इन जांचों के जरिए पेयजल की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखी जाती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में दो असफल परीक्षणों के स्थान और कारणों का विवरण नहीं दिया गया है। भास्कर नॉलेज : पानी में क्लोरीन की जांच क्यों जरूरी? पेयजल में अवशिष्ट क्लोरीन की जांच से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि पानी में कीटाणुओं को नियंत्रित रखने के लिए क्लोरीन की पर्याप्त मात्रा मौजूद है या नहीं। पानी के उपचार के बाद बची क्लोरीन की मात्रा जलापूर्ति के दौरान उसकी गुणवत्ता बनाए रखने का संकेत देती है। वहीं, बैक्टीरियोलॉजिकल जांच से पानी में बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी का पता लगाने में मदद मिलती है। दोनों जांचें अलग-अलग उद्देश्य पूरा करती हैं। इसलिए पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी और निर्धारित मानकों के अनुसार जांच जरूरी है। कोटा मंडल में रेलवे द्वारा इन दोनों तरीकों से पेयजल की गुणवत्ता पर नजर रखी जा रही है। गुणवत्ता में कमी मिलने पर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की जाती है।