सरकारी पानी की चोरी रोकने के लिए लगाई गई हाईटेक तकनीक ने टैंकर संचालन में बड़ी गड़बड़ियां उजागर कर दीं, लेकिन इसी सिस्टम को प्रदेशभर में लागू करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। जलदाय विभाग के मालवीय नगर और खोह नागोरियान वाटर हाइड्रेंट पर स्काडा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), कैमरा सर्विलांस और जीपीएस आधारित पायलट प्रोजेक्ट में पांच अलग-अलग अवधियों में 2,465 टैंकर ट्रिप का अंतर सामने आया। इसके बावजूद पिछले महीने पीईएमटी कमेटी की बैठक में रखे जाने से पहले ही प्रस्ताव वापस ले लिया गया। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का दावा है कि जल भवन के कुछ वरिष्ठ इंजीनियरों और टैंकर संचालकों के विरोध के कारण सिस्टम आगे नहीं बढ़ सका। दूसरी ओर, तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव भास्कर ए. सावंत और अखिल अरोड़ा तकनीक की सराहना करते हुए इसे प्रदेशभर में लागू करने की दिशा में काम करने को कह चुके थे। मालवीय नगर में जीपीएस में 64 ट्रिप, स्काडा ने 260 बार टैंकर भरना पकड़ा मालवीय नगर हाइड्रेंट पर दिसंबर 2024 में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। 14 से 31 दिसंबर के बीच जीपीएस रिकॉर्ड में 64 ट्रिप दर्ज थीं, जबकि स्काडा सिस्टम में 260 बार टैंकर में पानी भरने का रिकॉर्ड मिला। यानी महज 18 दिन में 196 ट्रिप का अंतर सामने आया। इसके बाद दिसंबर 2025 में 301 और अप्रैल-मई 2026 में 319 संदिग्ध ट्रिप सामने आने का दावा है। खोह नागोरियान हाइड्रेंट पर मई में 846 और जून में 803 ट्रिप का अंतर दर्ज किया गया। इस तरह पांच अवधियों में कुल अंतर 2,465 ट्रिप बैठता है। पानी मुफ्त, लेकिन 400-500 रुपए में बेचने का खेल जलदाय विभाग पात्र उपभोक्ताओं तक टैंकर से निशुल्क पानी पहुंचाता है। टैंकर संचालकों को दूरी के आधार पर प्रति ट्रिप 180 से 386 रुपए तक भुगतान किया जाता है। आरोप है कि कुछ चालक बिना अधिकृत ट्रिप के हाइड्रेंट से सरकारी पानी भरकर इसे 400 से 500 रुपए में बेच देते हैं। जयपुर में रोजाना करीब 500 टैंकर संचालित होने का दावा है। नंबर कैमरे ने पढ़ा, इंजीनियर की मंजूरी पर वॉल्व खुला; 4000 लीटर पर खुद बंद स्काडा सिस्टम में चालक एप के जरिए पानी भरने की अनुमति मांगता है। एआई कैमरा टैंकर का नंबर पढ़ता है। इंजीनियर के सत्यापन के बाद ही वॉल्व खुलता है और निर्धारित 4000 लीटर पानी भरते ही अपने आप बंद हो जाता है। इसके बाद उपभोक्ता तक पानी पहुंचने पर ओटीपी और वीडियो के जरिए डिलीवरी सत्यापित होती है। सत्यापन पूरा होने के बाद ही भुगतान के लिए इनवॉइस तैयार होता है। सिस्टम को स्टेट डेटा सेंटर पर होस्ट कर प्रदेशभर में लागू करने की तैयारी थी। सवाल; पायलट में हजारों संदिग्ध ट्रिप सामने आने के बाद उनकी जांच किस स्तर पर हुई? प्रदेशभर में सिस्टम लागू करने का प्रस्ताव पीईएमटी में जाने से पहले किसके निर्देश पर और क्यों वापस लिया गया? अतिरिक्त सीएस कर चुके तारीफ, मुख्य अभियंता बोले- मुझे स्काडा की जानकारी नहीं भास्कर ने जलदाय विभाग के मुख्य अभियंता देवराज सोलंकी से बात की। उन्होंने कहा, मुझे स्काडा के बारे में जानकारी नहीं है। अगर ऐसा कोई सिस्टम है तो जानकारी कर लेता हूं। जिस तकनीक से राजस्व की बचत होगी, उसे अपनाया जाएगा।