बंगाली समाज के तीन पांडालों में मां दुर्गा की विदाई बुधवार और गुरुवार को होगी। नेहरू पार्क स्थित दुर्गाबाड़ी में मंगलवार को पूजा-अर्चना के बाद सिंदूर खेला और प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। कुड़ी और कमला नेहरू नगर में बुधवार को सिंदूर खेला और विसर्जन होगा। बाईजी का तालाब में बुधवार को दशहरा उत्सव और गुरुवार को विदाई होगी। मान्यता है कि बुधवार को बेटी को ससुराल के लिए विदा नहीं किया जाता है। इसी परंपरा के चलते बाईजी का तालाब में विसर्जन एक दिन बाद होगा। कुड़ी में 9 वर्षीय रूपा बनी मां का स्वरूप कुड़ी भगतासनी सेक्टर-9 स्थित सिद्धेश्वर महादेव मंदिर परिसर में मंगलवार को नवमी पूजन हुआ। कोलकाता से आए पंडित शिबू मिश्रा ने पुष्पांजलि, कुमारी कन्या पूजा, बलिदान और हवन सहित अनुष्ठान संपन्न करवाए। प्रवक्ता सुमन विश्वास ने बताया कि कुमारी पूजा के लिए 9 वर्षीय रूपा विश्वास को शृंगारित कर मां के स्वरूप में विराजित किया गया। श्रद्धालुओं ने पूजन कर आशीर्वाद लिया। यहां बुधवार को महिलाएं सिंदूर खेला करेंगी और महोत्सव का समापन होगा। बाईजी का तालाब में हवन व पूजन हुआ, दशहरा उत्सव आज बाईजी का तालाब स्थित पांडाल के तपन संतरा ने बताया कि मंगलवार को कुमारी पूजन, हवन सहित अनुष्ठान हुए। बुधवार को दशहरा उत्सव मनाया जाएगा। गुरुवार को सिंदूर खेला और मां की विदाई होगी। बंगाल की परंपरा में मां दुर्गा को बेटी के रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि षष्ठी से दशमी तक मां पीहर में विराजती हैं। बेटी की विदाई की तरह मां को भी शुभ वेला और चौघड़िया देखकर विदा किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार बुधवार को बुध और चंद्रमा के बीच शत्रुता का भाव होने के कारण बेटी को ससुराल विदा करना शुभ नहीं माना जाता। ऐसी विदाई से वैवाहिक जीवन में परेशानी, रिश्तों में खटास और परिवार में मनमुटाव की आशंका मानी जाती है। कमला नेहरू नगर में भी बुधवार को मां की प्रतिमाओं का विसर्जन होगा। महिलाओं ने कहा कि इस बार मां सात दिन से अधिक समय तक उनके साथ विराजित रहीं। हर दिन मां को नई पोशाक पहनाकर पूजा की। नेहरू पार्क दुर्गाबाड़ी में ढाक पर थिरके युवा नेहरू पार्क स्थित दुर्गाबाड़ी में सुबह से शाम तक धार्मिक अनुष्ठान हुए। सैकड़ों महिलाओं ने मां दुर्गा सहित लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय का पूजन किया। बंगाल की परंपरा के अनुसार पान के पत्तों से मां के आंसू पोंछकर विदाई दी गई। महिलाओं ने उल्लू ध्वनि के साथ पूजन किया। युवा ढाक की थाप पर नाचते-गाते नजर आए। महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला की रस्म निभाई। शाम को मंदिर परिसर से शोभायात्रा निकाली गई। पांडाल में बनाए गए कृत्रिम कुंड में सभी प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया।