उदयपुर में मां की रजिस्टर्ड वसीयत होने के बावजूद बेटे को एफडी (फिक्स्ड डिपॉजिट) की रकम नहीं देना बैंक ऑफ बड़ौदा को भारी पड़ गया। बैंक ने वसीयत का अदालती प्रमाण यानी प्रोबेट ऑफ विल पेश करने की शर्त लगाकर करीब पांच साल तक भुगतान रोके रखा। मामले में उदयपुर की स्थायी लोक अदालत ने बैंक की कार्यप्रणाली को गंभीर लापरवाही और सेवा में कमी मानते हुए पीड़ित बेटे को चारों एफडी की पूरी राशि ब्याज सहित लौटाने के आदेश दिए हैं। अदालत ने बैंक पर मानसिक परेशानी के लिए 21 हजार रुपए और मुकदमे के खर्च के लिए 11 हजार रुपए, यानी कुल 32 हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया है। स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष महेंद्र सिंह सिसोदिया और सदस्य प्रमोद कुमार दाणी व डॉ. सुरभि मेनारिया की पीठ ने यह फैसला सुनाया। आदेश के अनुसार, यदि बैंक एक महीने के भीतर भुगतान नहीं करता है, तो उसे 21 अक्टूबर 2021 से वास्तविक भुगतान की तारीख तक पूरी रकम पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। मां ने 13 साल पहले ही बेटे के नाम कर दी थी रजिस्टर्ड वसीयत मामला उदयपुर के सेंट्रल एरिया निवासी संजय पालीवाल का है। उनके पिता का नाम स्वर्गीय गणेशलाल पालीवाल है। संजय की मां मनोहर देवी के बैंक ऑफ बड़ौदा की कृषि मंडी मार्केट यार्ड शाखा में चार एफडी खाते थे। मनोहर देवी ने 1 दिसंबर 2008 को ही इन जमा राशियों के संबंध में बेटे संजय के नाम रजिस्टर्ड वसीयत कर दी थी। 1 अप्रैल 2021 को मनोहर देवी का निधन हो गया। इसके बाद संजय ने वसीयत के आधार पर चारों एफडी की राशि अपने बैंक खाते में ट्रांसफर करने के लिए आवेदन किया। हालांकि, बैंक ने भुगतान करने के बजाय उनसे अतिरिक्त कानूनी दस्तावेज की मांग शुरू कर दी। हाईकोर्ट का फैसला दिखाया, फिर भी नहीं माने बैंक अफसर बैंक ने 14 अक्टूबर 2021 को पत्र भेजकर संजय से प्रोबेट ऑफ विल पेश करने को कहा। इसके जवाब में संजय ने अपने वकील श्रीराम शाकद्वीपी और भेरूलाल गायरी के माध्यम से 21 अक्टूबर 2021 को बैंक को पत्र भेजा। इसमें राजस्थान हाईकोर्ट के 1997 के सुल्तान सिंह बनाम बृजराज सिंह मामले के फैसले का हवाला देते हुए बताया गया कि राजस्थान में वसीयत के लिए अदालत से प्रोबेट लेना अनिवार्य नहीं है। इसके बावजूद बैंक ने एफडी की रकम जारी नहीं की। संजय ने 23 अक्टूबर 2024 को भी दोबारा पत्र लिखकर भुगतान की मांग की, लेकिन बैंक ने भुगतान नहीं किया। आखिरकार, करीब पांच साल तक बैंक के चक्कर लगाने के बाद उन्होंने 15 अप्रैल 2026 को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम की धारा 22 के तहत स्थायी लोक अदालत में मामला दायर किया। बैंक ने सुलह से किया इनकार, कोर्ट में साबित नहीं कर पाया अपनी बात मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों के बीच समझाइश और सुलह की कोशिश की, लेकिन बैंक ने सुलह की संभावना से साफ इनकार कर दिया। बैंक के वकील मनोज कुमार पंवार और अधिकारी भरत कुमार झा ने शपथ पत्र देकर दलील दी कि परिवादी ने जरूरी दस्तावेज और प्रक्रिया पूरी नहीं की, इसलिए भुगतान रुका रहा। अदालत ने रिकॉर्ड की जांच में पाया कि बैंक ने यह स्पष्ट ही नहीं किया कि उसने ग्राहक से आखिर कौन से दस्तावेज मांगे थे। न ही बैंक ने इस संबंध में ग्राहक को कोई लिखित पत्र या सूचना दी थी। इसके अलावा मां के निधन के बाद किसी दूसरे दावेदार ने भी इस पैसे पर दावा या वसीयत पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। अदालत ने माना कि बैंक ने कर्तव्य पालन में उदासीनता बरतते हुए जानबूझकर भुगतान रोका, जिससे परिवादी पांच साल तक अपने ही पैसे के इस्तेमाल से वंचित रहा।