किरण राजपुरोहित | पाली कहीं वोट डालने का उत्साह था, लेकिन चुनाव किस पद के लिए हो रहा है, इसकी जानकारी अधूरी थी। कहीं ग्रामीण अपने गांव को फिर से पंचायत का दर्जा दिलाने की मांग पर मतदान से दूर रहे। पंचायत चुनाव के दौरान पाली के छह गांवों में लोकतंत्र की ये अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं। चोटिला में कुछ महिला मतदाता यह नहीं बता सकीं कि वे किस पद के लिए वोट डाल रही हैं। वहीं, उमकली, सरगरों की ढाणी और कुंडली चारणा के ग्रामीणों ने पंचायत का दर्जा वापस लेने के विरोध में चुनाव का बहिष्कार किया। इन तस्वीरों के बीच 95 साल की रूपी देवी को उनके बेटे और पोते गोद में उठाकर मतदान केंद्र तक लाए। दूसरी तरफ गढ़वाड़ा में वोट डालने पहुंचीं महिलाओं ने बेटी की पढ़ाई के लिए सात िकमी दूर जाने, मनरेगा में काम नहीं मिलने और खारे पानी से घरों को हो रहे नुकसान की समस्याएं बताईं। यानी मतदान के दिन गांवों में सिर्फ प्रत्याशी चुनने की चर्चा नहीं थी, बल्कि चुनावी जानकारी, स्थानीय अधिकार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल भी सामने आए। सुबह 10 बजे, चोटिला : 95 साल की रूपी देवी को गोद में उठाकर बूथ तक पहुंचाया गढ़वाड़ा में मतदान के दौरान सजनपूरा की पाचकी देवी से बातचीत हुई तो चुनाव की चर्चा बेटी की पढ़ाई की समस्या तक पहुंच गई। उन्होंने बताया कि गांव में आठवीं तक ही स्कूल है। बेटी नौवीं में पढ़ती है, इसलिए उसे सात किलोमीटर दूर गढ़वाड़ा जाना पड़ता है। करीब 15 बच्चों के लिए किराये की गाड़ी लगाई गई थी। प्रत्येक बच्चे से 300 रुपए महीना लिया जाता था, लेकिन खर्च नहीं निकलने के कारण चालक ने गाड़ी बंद कर दी। तुलसी देवी ने पांच साल से मनरेगा में काम नहीं मिलने की शिकायत की। वहीं, सूरज कंवर ने खारे पानी से घरों को हो रहे नुकसान की बात कही। उनका कहना था कि पानी के कारण दीवारें, रसोई और बाथरूम खराब हो रहे हैं। पीने के पानी के लिए दो हजार रुपए तक खर्च कर टैंकर मंगवाना पड़ता है। मतदान के दिन सामने आए इन बयानों ने गांव की उन समस्याओं को भी सामने रखा, जिनका समाधान ग्रामीण स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से चाहते हैं। सिणगारी के बूथ नंबर 22 पर 1107 में से 460 मतदाता वोट डाल चुके थे, जबकि बूथ नंबर 21 पर 1102 में से 336 मतदाताओं ने मतदान किया था। दोनों बूथों पर कुल 2209 मतदाताओं में से 796 वोट पड़ चुके थे। यानी मतदान करीब 36.03% था। इसी दौरान दुदली से आईं पेपी और कनकी लंबी कतार देखकर वापस लौटने लगीं। उनका कहना था कि घंटों खड़े रहने के बजाय बाद में आकर वोट डालेंगी। मतदान केंद्र पर भीड़ और इंतजार के बीच यह सवाल भी सामने आया कि क्या दोनों बाद में मतदान करने लौटीं। उमकली में मतदान का माहौल बाकी गांवों से अलग था। उमकली, सरगरों की ढाणी और कुंडली चारणा के ग्रामीण पंचायत का दर्जा वापस लेने की मांग पर चुनाव का बहिष्कार कर रहे थे। देवाण के बूथ नंबर 64 पर 1143 मतदाता दर्ज थे, लेकिन मतदान बेहद कम हुआ। ग्रामीणों का दावा था कि बूथ पर पड़े पांच वोट सरकारी कर्मचारियों के पोस्टल बैलेट थे। महिपाल सिंह चारण और जब्बर सिंह दास ने आरोप लगाया कि उमकली को पहले ग्राम पंचायत बनाया गया था, लेकिन बाद में राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण उसका दर्जा हटाकर देवाण को पंचायत बना दिया गया। ग्रामीणों ने भाजपा के वरिष्ठ नेता मदन राठौड़ पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा-वे राठौड़ को खुश नहीं कर पाए, इसलिए उनका हक छीन लिया। उनका दावा था कि इस फैसले से करीब 1500 लोगों के अधिकार प्रभावित हुए हैं। दोपहर करीब तीन बजे तहसीलदार डॉ. दिलीप सिंह ग्रामीणों को मतदान के लिए समझाने पहुंचे, लेकिन वे अपनी मांग पर अड़े रहे। ग्रामीणों का कहना था कि जब तक उमकली को दोबारा ग्राम पंचायत का दर्जा नहीं मिलता, वे किसी चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे। चोटिला में 95 वर्षीय रूपी देवी को उनके बेटे परवत सिंह और पोते ने गोद में उठाकर मतदान केंद्र पहुंचाया। उम्र अधिक होने और चलने में परेशानी के बावजूद वे वोट डालने पहुंचीं। 85 वर्षीय मीरा देवी मतदान के लिए आईं। सुबह 10 बजे तक यहां 300 मतदाता मतदान कर चुके थे। बुजुर्गों का उत्साह दिख रहा था, मतदान कर बाहर निकलीं कुछ महिलाओं से चुनाव के बारे में पूछा तो जवाब अलग-अलग मिले। चीकू देवी, तारा और धापो में से किसी ने सरपंच का चुनाव बताया, किसी ने कांग्रेस-भाजपा का नाम लिया तो किसी ने हाथ और कमल का। पहली बार वोट डालने पहुंचीं धापो भी यह स्पष्ट नहीं बता सकीं कि वे किस पद के लिए मतदान कर रही हैं।