भास्कर न्यूज| धौलपुर लुधपुरा गांव की हरप्यारी ने परंपरागत खेती से हटकर एकीकृत कृषि मॉडल अपनाया है। लोग कहते थे कि खेती का यह नया प्रयोग जमीन बर्बाद कर देगा, दो साल तक कुछ नहीं उगेगा तो परिवार का पेट कैसे भरेगा। आज जिस डेढ़ बीघा जमीन को लेकर लोग सवाल उठाते थे। उसी खेत ने परिवार को आत्मनिर्भर बना दिया है। एक ही जगह 20 से ज्यादा तरह की फसलें उग रही हैं। मंजरी फाउंडेशन ने खेत में पानी की व्यवस्था कराई और फव्वारा व ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगवाई। इससे कम पानी में कई तरह की फसलें उगाना संभव हुआ। खेती ने रोका पति का पलायन:- इस बदलाव का असर सिर्फ आमदनी तक सीमित नहीं रहा। पहले हरप्यारी के पति साल में 4 से 5 महीने मजदूरी के लिए बाहर जाते थे, लेकिन अब खेत में सालभर काम और आमदनी होने से उनका पलायन रुक गया है। इसी कमाई से परिवार ने तीन गायें और एक छोटा ट्रैक्टर भी खरीदा है। हरप्यारी ने डेढ़ बीघा जमीन को इस तरह तैयार किया कि खेत का कोई हिस्सा खाली न रहे। बहुस्तरीय खेती के तहत ऊपरी हिस्से में नींबू, अमरूद और करौंदे के पेड़ हैं। बीच में लौकी, तोरई की बेलों के साथ टमाटर, बैंगन, फूलगोभी और मिर्च उगाई। जमीन पर आलू, पालक, मेथी, धनिया के साथ जीरा, सौंफ, अजवाइन और लहसुन जैसी फसलें हैं। परिवार की तीन गायों के गोबर से बायोगैस तैयार होती है। बायोगैस की स्लरी से केंचुआ खाद तैयार की जाती है। इसकी बिक्री से हर महीने करीब 6500 रुपए की आमदनी होती है।