राजस्थान हाईकोर्ट ने अजमेर की पृथ्वीराज नगर योजना में प्राकृतिक जलस्रोतों, जल निकासी मार्गों और जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेंट एरिया) के संरक्षण के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि वे राजस्व रिकॉर्ड और तकनीकी दस्तावेजों की बारीकी से जांच करें। अदालत ने कहा- अधिकारी भूमि की वास्तविक स्थिति का पता लगाएं और यह जांचें कि प्रस्तावित विकास योजना (डवलेपमेंट प्लान) से प्राकृतिक जल प्रवाह और जल भंडारण पर क्या असर पड़ेगा। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने यह आदेश कमलेश मेहरात की ओर से साल 2012 में दायर की गई जनहित याचिका को निस्तारित करते हुए दिए। विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ नहीं खंडपीठ ने कहा- किसी विकास योजना में नदी, नाला, तालाब या जलग्रहण क्षेत्र के रूप में दर्ज भूमि को शामिल कर लेने मात्र से उसके प्राकृतिक स्वरूप को बदलने का अधिकार नहीं मिल जाता। ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले संबंधित कानूनों और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार करना अनिवार्य है। स्वस्थ पर्यावरण जीवन का अधिकार अदालत ने टिप्पणी की कि स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। राज्य सरकार इन सार्वजनिक संसाधनों की 'ट्रस्टी' (न्यासी) है और सामुदायिक हित में इनका संरक्षण करना सरकार की जिम्मेदारी है।