अलवर में पंचायती राज चुनाव के दो चरण सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं। सरपंच और पंच पद के चुनाव परिणाम मतदान के दिन ही घोषित कर दिए गए, जिसमें आम लोगों से लेकर खास चेहरों तक की जीत ने सभी का ध्यान खींचा है। चुनावी नतीजों में राजनीतिक रसूख, मेहनत और संघर्ष की बड़ी कहानियां सामने आई हैं। अलवर जिले में सबसे बड़ी जीत: पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सुदीप डीगवाल ने मारी बाजी अलवर के एमआईए स्थित गूंदपुर ग्राम पंचायत में इस बार सबसे बड़ी जीत दर्ज की गई है। यहां बाबू शोभाराम राजकीय कला कॉलेज के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सुदीप डीगवाल ने 1576 वोटों के अंतर से जीत हासिल की है। खास बात यह है कि सुदीप के पिता मूलचंद डीगवाल ने जिला परिषद सदस्य पद के लिए वार्ड नंबर 9 से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा है। इसका परिणाम 20 नवंबर को आएगा। वकील विष्णु चावड़ा के अनुसार, डीगवाल परिवार की पूरे एमआईए क्षेत्र में बेहतरीन प्रतिष्ठा है। मूलचंद डीगवाल भी खासे बड़े अंतर से जीत दर्ज कर सकते हैं। बैंड बाजा बजाने वाले गीलाराम की पत्नी आरती देवी बनीं सरपंच नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के विधानसभा क्षेत्र अलवर ग्रामीण के अंतर्गत आने वाली मालाखेड़ा की ठुमरेला ग्राम पंचायत में मुकाबला बेहद रोमांचक रहा। यहां आरती देवी पत्नी गीलाराम ने मीरा देवी पत्नी बाबूलाल को 34 वोटों के अंतर से शिकस्त दी। नई सरपंच बनीं आरती देवी के पति गीलाराम लंबे समय से बैंड में काम करते रहे हैं। उनका खुद का बैंड भी है। इस अनोखी जीत पर खुशी जाहिर करते हुए गीलाराम ने कहा- पत्नी के सरपंच बनने से पूरे गांव में खुशी का माहौल है। ग्रामीण जनता ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया है। मजदूरी और बेलदारी करने वाले सुरेश चंद बने झालाटाला के सरपंच अलवर के लक्ष्मणगढ़ उपखंड की झालाटाला ग्राम पंचायत में जीत का फैसला काफी नाटकीय रहा। यहां उम्मीदवारों जयराम मीणा पुत्र बनवारी लाल मीणा और सुरेश चंद मीणा पुत्र शिंभूदयाल मीणा को बराबर-बराबर 700-700 वोट मिले। इसके बाद पर्ची (टाई) डाली गई, जिसमें सुरेश चंद का नाम निकला और वे गांव के नए सरपंच चुने गए। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले सुरेश चंद के पास केवल दो बीघा खेती की जमीन है। गुजारे के लिए उन्होंने कई सालों तक चिनाई मिस्त्री के साथ बेलदारी (मजदूरी) का काम किया है। पिछले कुछ सालों से वे गांव के लोगों के बीच रहकर सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे, जिससे वे जनता की नजरों में आए। सुरेश ने बताया कि करीब तीन महीने पहले ही उनकी मां का कैंसर की बीमारी के कारण निधन हो गया था। इस पारिवारिक दुखों के बाद उन्होंने जनता की सेवा में और अधिक मन लगाया तथा घर-घर जाकर लोगों का सुख-दुःख बांटा। जनता ने इसी समर्पण पर भरोसा जताते हुए उन्हें अपना सरपंच चुन लिया, जिससे उनके परिवार और पूरे गांव में खुशी की लहर है।