प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाओं, फायर सेफ्टी, दवाइयों की गुणवत्ता और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने कहा- बेहतर चिकित्सा सुविधा पाना व्यक्ति के 'जीवन जीने' के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ है। इसलिए सरकार की कार्रवाई केवल कागजी आश्वासनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि अस्पतालों की व्यवस्था में वास्तविक सुधार दिखना चाहिए। यह निर्देश मुख्य न्यायाधीश संजय के अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने असीम सिमलोट की जनहित याचिका को निस्तारित करते हुए दिए। उन्होंने SMS अस्पताल में अग्निकांड के बाद कोर्ट में PIL लगाई थी। याचिका सरकारी अस्पतालों में बुनियादी ढांचे और सुरक्षा व्यवस्था में कमियों को लेकर दायर की गई थी। इसमें कैग की साल 2024 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया था कि सरकारी अस्पतालों की कमियों की जानकारी सामने आने के बावजूद करीब दो साल तक प्रभावी सुधार नहीं किए गए। सरकार ने कहा- व्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी कदम उठाए इस पर सरकार ने हाईकोर्ट में जवाब देते हुए अस्पतालों की व्यवस्थाओं में सुधार के लिए उठाए गए कई कदमों की जानकारी दी। सरकार ने कहा कि SMS अस्पताल में आग की घटना के बाद फायर सेफ्टी मजबूत करने के लिए जरूरी कदम उठाए गए। वहीं अस्पतालों में इंफ्रास्ट्रक्चर का नवीनीकरण किया गया। दवाइयों की गुणवता जांचने के लिए टेस्टिंग और क्वालिटी कंट्रोल की व्यवस्था की गई है। साथ ही बायो वेस्ट के निस्तारण की भी व्यवस्था की गई है। 1. एसएमएस अस्पताल में फायर सेफ्टी 2. अस्पतालों का नवीनीकरण 3. दवाइयों की गुणवत्ता 4. बायोमेडिकल वेस्ट का निस्तारण स्वास्थ्य सेवाओं में प्रभावी सुधार दिखना चाहिए सरकार के जवाब पर हाईकोर्ट ने कहा- राज्य सरकार ने प्रदेश के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे की कमियों को दूर करने के लिए कई कदम उठाए हैं। ऐसे में जनहित याचिका में और अधिक निर्देश देने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अस्पतालों में पर्याप्त, सुलभ और समय पर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के मौलिक अधिकार से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में सरकार और संबंधित अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर में मौजूद शेष कमियों को दूर करने के लिए लगातार प्रयास करते रहेंगे।