जैसलमेर में ओरण भूमि के संरक्षण और उसे राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाने की मांग अब आंदोलन से निकलकर चुनावी मैदान तक पहुंच गई है। लंबे समय से पदयात्राओं, धरनों और जनआंदोलनों के जरिए सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश कर रही टीम ओरण ने अब जिला परिषद चुनाव में सीधे सरकार को चुनौती देने का ऐलान किया है। टीम जिले की सभी 21 जिला परिषद सीटों पर पर्यावरण प्रेमियों को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़वाएगी। इस कड़ी में सोमवार को वार्ड संख्या 18 से पर्यावरण प्रेमी देवी सिंह भादरिया ने नामांकन दाखिल कर इस चुनावी मुहिम की शुरुआत की। टीम का कहना है कि अब ओरण का मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में होगा और राजनीतिक दलों को इस पर अपना रुख स्पष्ट करना पड़ेगा। सभी वार्डों में प्रत्याशी उतारने की तैयारी
टीम ओरण के सुमेर सिंह सांवता ने बताया कि जैसलमेर जिले में ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है। इस मांग को लेकर कई बार पदयात्राएं निकाली गईं। टीम के सदस्य जैसलमेर से जयपुर तक पैदल पहुंचे और सरकार का ध्यान इस गंभीर मुद्दे की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया। इसके बावजूद आंदोलनकारियों के अनुसार उनकी मुख्य मांग पूरी नहीं हुई है। सांवता ने कहा कि हाल ही में नवरात्रि के दौरान भी टीम ने करीब 400 किलोमीटर की पदयात्रा की। इस दौरान देवी मंदिरों में पैदल पहुंचकर दर्शन किए और ओरण संरक्षण का संदेश दिया। आंदोलन के अलग-अलग प्रयासों के बावजूद सरकार की ओर से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने पर अब चुनाव के जरिए अपनी बात रखने का निर्णय किया है। राजनीतिक दलों को मुद्दे पर जवाब देना होगा
सांवता के अनुसार, जिला परिषद की सभी 21 सीटों पर पर्यावरण प्रेमियों को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतारने की तैयारी है। इसका मकसद किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न पर निर्भर रहने के बजाय ओरण संरक्षण के मुद्दे को सीधे जनता के बीच ले जाना है। टीम चाहती है कि चुनाव में उतरने वाले सभी राजनीतिक दल ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाने और उसके संरक्षण को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट करें। उन्होंने कहा कि जैसलमेर की पर्यावरण प्रेमी जनता अब खुद चुनावी मैदान में उतरकर सरकार को जवाब देगी। राजनीतिक दलों को भी इस आंदोलन से सबक लेना चाहिए और ओरण भूमि को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करवाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। जानिए- क्यों हैं ओरण का संरक्षण जरूरी
ओरण राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में परंपरागत रूप से संरक्षित पवित्र वन और सामुदायिक भूमि क्षेत्र हैं। इनका संबंध स्थानीय देवी-देवताओं, लोक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं से है। इन क्षेत्रों में खेजड़ी, रोहिड़ा सहित स्थानीय वनस्पतियां, वन्यजीव और पक्षियों को प्राकृतिक आवास मिलता है। पशुओं के लिए चारा, ग्रामीणों के लिए प्राकृतिक संसाधन और वर्षा जल के संरक्षण में भी इनकी अहम भूमिका है। राजस्थान वन विभाग के अनुसार, ओरण जैव विविधता और पारंपरिक सामुदायिक संरक्षण व्यवस्था के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।