जवाहर कला केंद्र में चल रहे 11 दिवसीय राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव ‘लोकरंग’ के 29वें संस्करण के पांचवें दिन राजस्थान के अग्नि नृत्य ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। बीकानेर के जसनाथी संप्रदाय के सिद्ध कलाकारों ने जलते अंगारों पर नृत्य करते हुए अपनी परंपरा और साधना का प्रदर्शन किया। कलाकारों को अंगारों पर चलते, उन्हें हाथों में उठाते और मुंह में लेकर बाहर निकालते देख दर्शक हैरान रह गए। प्रस्तुति के दौरान मंच के आसपास मौजूद कला प्रेमी तालियों से कलाकारों का उत्साह बढ़ाते रहे। अग्नि नृत्य के साथ मध्यवर्ती मंच पर पंजाब की लुड्डी, राजस्थान का लंगा गायन और उत्तर प्रदेश का पाई डंडा भी आकर्षण का केंद्र रहे। अलग-अलग राज्यों के लोक नृत्य और संगीत ने परिसर को रंगों, ताल और सुरों से भर दिया। शिल्पग्राम में भी दिनभर कठपुतली, बहुरूपिया, लोक गायन, आदिवासी नृत्य और अन्य पारंपरिक कलाओं की प्रस्तुतियां होती रहीं। यहां देखिए इवेंट के फोटोज… आस्था और परंपरा से जुड़ा अग्नि नृत्य अग्नि नृत्य राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र की विशिष्ट लोक परंपरा है, जिसे जसनाथी संप्रदाय के सिद्ध कलाकार प्रस्तुत करते हैं। इस परंपरा का प्रमुख केंद्र बीकानेर के कतरियासर गांव को माना जाता है। यह केवल मंचीय करतब नहीं, बल्कि जसनाथी समुदाय के रात्रि जागरण और भक्ति परंपरा से जुड़ा अनुष्ठान भी है। परंपरागत रूप से जागरण में भजन-गायन, वादन और धार्मिक क्रियाओं के बाद अग्नि नृत्य किया जाता है। इसकी प्रस्तुति में गुरु जसनाथ और सिद्ध परंपरा के प्रति श्रद्धा का भाव प्रमुख रहता है। इसके लिए नृत्य के लिए लकड़ियों को जलाकर अंगारों का धूणा तैयार किया जाता है। जसनाथी सिद्ध ढोल और अन्य वाद्यों की लय के साथ धूणे के चारों ओर गति करते हैं और फिर अंगारों पर उतरते हैं। प्रस्तुति के दौरान वे अंगारों पर चलते और उछलते हैं, उन्हें हाथों में उठाते हैं तथा कुछ करतबों में मुंह में लेकर बाहर फूंकते हैं। इस तरह की क्रियाओं को नृत्य का हिस्सा माना जाता है। जसनाथी परंपरा में अंगारों के साथ किए जाने वाले इन करतबों को ‘मटिरा खाना’ भी कहा जाता है। अग्नि नृत्य की लय केवल कदमों से नहीं बनती। इसमें गायन और वादन की गति के साथ कलाकारों की चाल तेज होती जाती है। वे गोलाकार गति में अंगारों के बीच आगे बढ़ते, झुकते और उछलते हैं। अंगारों पर उतरने और उनसे बाहर आने के दौरान ताल, संतुलन और अभ्यास का विशेष महत्व रहता है। इस प्रस्तुति में कलाकारों का शरीर और कदम संगीत की लय के साथ चलते हैं, जबकि दर्शकों के लिए अंगारों पर किए जाने वाले करतब रोमांच का कारण बनते हैं। लुड्डी की थिरकन और लंगा गायन के सुर मध्यवर्ती मंच पर शाम की शुरुआत राजस्थान के लंगा गायन से हुई। बुंदू खां और उनकी टीम ने सधे सुरों और साजों की संगत से महफिल जमाई। राजस्थान की लोक संगीत परंपरा से जुड़े लंगा गायन में कलाकारों की तानों पर दर्शक दाद देते नजर आए। इसके बाद पंजाब की लुड्डी ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर किया। यह नृत्य जीत, कामयाबी और शादी-ब्याह जैसे खुशी के अवसरों पर किया जाता है। सिर की लयबद्ध हरकतें, तालियां, उंगलियों की चटकारी और गोल घूमते कदम इसकी खास पहचान हैं। कलाकारों ने जोश और मस्ती के साथ प्रस्तुति दी तो दर्शक भी तालियों से उनका उत्साह बढ़ाते रहे। उत्तर प्रदेश के पाई डंडा ने भी मंच पर अपनी अलग छाप छोड़ी। इसके अलावा मणिपुर का लाई हरोबा और थांगता, तमिलनाडु का करईकल कावड़ी अट्टम, थपट्टम और झिकाट्टम तथा पुरुलिया छऊ की प्रस्तुतियां हुईं। राजस्थान के चंग नृत्य, महाराष्ट्र की लावणी और गुजरात के तलवार रास ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा। शिल्पग्राम में लोक कलाओं की विविधता शिल्पग्राम में कठपुतली, बहुरूपिया, आदिवासी नृत्य, लोक गायन, अलगोजा वादन, जादू कला, पद गायन, मांड गायन और चकरी नृत्य की प्रस्तुतियां हुईं। बाड़मेर के मांगणियार कलाकारों ने गायन से दर्शकों को बांधा। जम्मू-कश्मीर के जागरणा, हिमाचल की किन्नौरी नाटी, गोवा के कुणबी नृत्य और हरियाणा के फाग ने भी अपनी लोक लय से माहौल बनाया।