न्यायाधीशों की कमी के चलते सुप्रीम कोर्ट में 96 हजार से अधिक मामले सुनवाई के लिए विचाराधीन हैं, जबकि देशभर की अधीनस्थ अदालतों में ऐसे लंबित मामलों की संख्या करीब 4 करोड़ 99 लाख 11 हजार 920 है। राजस्थान हाईकोर्ट की बात करें तो यहां पर भी 6.96 लाख केस पेंडिंग हैं। इस समस्या से उदयपुर भी अछूता नहीं है। यहां भी मुकदमों का बोझ लगातार बना हुआ है। उदयपुर की 43 कोर्टों में 1 लाख 14 हजार 261 केस पेंडिंग चल रहे हैं। इनमें 95 हजार 841 आपराधिक और 18 हजार 420 सिविल मामले हैं। यानी कुल पेंडेंसी में करीब 84 प्रतिशत हिस्सेदारी क्रिमिनल केस की है। हालात यह हैं कि 43 में से 5 कोर्ट में न्यायाधीश ही नहीं हैं। ऐसे में यह पेंडेंसी और बढ़ने की आशंकाएं जन्म ले रही हैं। सबसे ज्यादा मजिस्ट्रेट सबंधी 83 हजार से ज्यादा मामले लंबित पेंडिंग में सबसे ज्यादा 83 हजार 711 मामले मजिस्ट्रेट संबंधी हैं। यह कुल पेंडेंसी का करीब 73 प्रतिशत है। इसके बाद 8 हजार 292 सिविल केस, 5 हजार 436 विविध आपराधिक आवेदन और 3 हजार 958 विविध सिविल आवेदन लंबित हैं। सत्र न्यायालयों में 3 हजार 675 मामले पेंडिंग हैं। इसके अलावा संशोधित सुनिश्चित करियर प्रगति (एमएसीपी) से जुड़े 2 हजार 166 और विविध नागरिक मामलों के 1 हजार 946 मुकदमे लंबित चल रहे हैं। पिछले माह 2,756 नए केस आए, 4,119 का निस्तारण पिछले महीने अदालतों में 2 हजार 756 नए केस सामने आए। इनमें 454 सिविल और 2 हजार 302 क्रिमिनल केस थे। इसी अवधि में 716 सिविल और 3 हजार 403 क्रिमिनल यानी कुल 4 हजार 119 केसों का निस्तारण किया गया। इस तरह नए दर्ज मामलों से 1 हजार 363 ज्यादा मुकदमों का निस्तारण हुआ। हालांकि, इसके बावजूद कुल लंबित मामलों की संख्या 1.14 लाख से ज्यादा बनी हुई है। अपील व अन्य केसों की भी लंबी सूची अदालतों में 1 हजार 533 आपराधिक अपील और 904 कार्यकारी याचिकाएं लंबित हैं। किशोर न्याय से जुड़े 813, आपराधिक संशोधन के 580 और नागरिक अपील के 527 केस फैसले का इंतजार कर रहे हैं। विविध नागरिक अपील के 296, श्रम मामलों के 224, जमानत अपील के 90, विविध श्रम के 69 और औद्योगिक मामलों के 32 केस पेंडिंग हैं। विवाह याचिका के 2, वाणिज्यिक अपील का एक और अन्य 6 मामले भी सूची में हैं। चुनौती: जज नहीं होने से मुकदमों का बोझ बढ़ रहा न्यायिक व्यवस्था में जजों के खाली पद भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। 43 अदालतों में से 5 में न्यायाधीश नहीं हैं। ये अदालतें इसी साल मई में हुए न्यायिक अधिकारियों के तबादलों के बाद से खाली पड़ी हैं। इनमें अतिरिक्त जिला एवं सेशन न्यायाधीश-1, फैमिली कोर्ट-3, लेबर कोर्ट, मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण-2 और पॉक्सो मामलों की विशेष अदालत-1 शामिल हैं। इन अदालतों में पारिवारिक विवाद, श्रमिकों से जुड़े मामले, सड़क दुर्घटना में मुआवजे के दावे और बच्चों के साथ यौन अपराधों से जुड़े मुकदमों की सुनवाई होती है। लेकिन, जज नहीं होने के कारण मुकदमों का बोझ बढ़ रहा हैं। दूसरी ओर इन अदालतों में सुनवाई के लिए नियमित जज भी नहीं मिल रहे हैं।