अफीम उत्पादक किसानों पर तस्करी के आरोपों के बीच पूर्व डेयरी चेयरमैन और किसान नेता बद्रीलाल जाट (जगपुरा) ने सरकार की अफीम नीति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि किसान अपनी उपज को बाहर बेचता है क्योंकि उनको उनकी उपज का उचित दाम नहीं मिलता, जबकि खेती पर सालभर लाखों रुपए खर्च होते हैं। ऐसे किसान को तस्कर कहना पूरी तरह गलत है। किसानों को मजबूर किया जा रहा है। उनका कहना है कि सरकार किसानों से पूरी अफीम जमा करवा लेती है, लेकिन उसकी कीमत इतनी कम देती है कि खेती का खर्च तक नहीं निकलता। डोडा भी पहले सरकार खरीदती थी, लेकिन अब उसका भी कोई पैसा नहीं मिलता। ऐसे में किसान अगर अपनी लागत निकालने के लिए कहीं और बेचने की कोशिश करता है तो उसे अपराधी बना दिया जाता है। जाट ने कहा कि सरकार अगर किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दे दे तो कोई भी किसान अपनी उपज को बाहर नहीं बेचेगा। उन्होंने दावा किया कि उचित दाम मिलने पर अवैध कारोबार अपने आप खत्म हो जाएगा। उसके बाद अगर किसान तस्करी करें तो सूली पर चढ़ा देना। इसी के साथ उन्होंने नई अफीम नीति, सीपीएस व्यवस्था और मॉर्फिन की शर्तों पर भी सवाल उठाए और चेतावनी दी कि मांगें नहीं मानी गईं तो पंचायत चुनाव के बाद बड़ा आंदोलन किया जाएगा। सरकार की नीति पर उठाए सवाल, बोले- हर साल नियम बदलकर किसानों को उलझाया जा रहा बद्रीलाल जाट ने कहा कि इस बार की अफीम नीति ने हजारों किसानों की उम्मीदें तोड़ दी हैं। पिछले साल 4.2 प्रतिशत मॉर्फिन के आधार पर पट्टे दिए गए थे, लेकिन इस बार इसे बढ़ाकर 4.4 प्रतिशत कर दिया गया। इसका सीधा असर हुआ कि जिले के करीब 15 से 20 प्रतिशत किसान सीपीएस प्रणाली (बिना चीरा लगाए पूरा डोडाचूरा सरकार को देना) में चले गए। उन्होंने कहा कि कई किसानों ने पिछले साल ज्यादा डोडा तौलवाया ताकि इस बार उन्हें चीरे के पट्टे मिल जाएं। कुछ किसानों ने तो अतिरिक्त डोडा खरीदकर भी औसत पूरी की, लेकिन सरकार ने उन्हें भी सीपीएस में डाल दिया। जिन किसानों की फसल प्राकृतिक कारणों से खराब हुई या जो चीरा नहीं लगा पाए, उन्हें भी राहत देने के बजाय उसी श्रेणी में शामिल कर दिया गया। जाट ने कहा कि पांच आरी का सीपीएस पट्टा किसानों के लिए किसी काम का नहीं है। इतनी कम जमीन से किसान की आय नहीं बढ़ सकती। उनका कहना है कि सरकार हर साल नई नीति लाती है और नियम बदल देती है, जबकि एक बार स्थायी नीति बना दी जाए तो किसानों में भरोसा पैदा होगा। 'सरकार पूरी उपज लेती है, लेकिन मेहनत का दाम नहीं देती' जाट ने कहा कि अफीम की खेती में किसान पूरे साल मेहनत करता है। बीज, खाद, मजदूरी और दूसरी लागत मिलाकर काफी खर्च होता है, लेकिन जब उपज तैयार होती है तो सरकार पूरी अफीम अपने पास जमा करवा लेती है। इसके बदले मिलने वाला भुगतान लागत के मुकाबले बहुत कम है। उन्होंने कहा कि पहले डोडा भी सरकार खरीदती थी और किसानों को उसका अलग भुगतान मिलता था, लेकिन अब डोडा खेत में ही नष्ट करना पड़ता है और उसका कोई पैसा नहीं मिलता। इससे किसान को दोहरा नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि जब सरकार ही किसान की पूरी उपज का सही मूल्य नहीं दे रही तो फिर किसान की आर्थिक हालत कैसे सुधरेगी। 'बाहर बेचना मजबूरी है, इसे तस्करी कहना गलत' किसान नेता ने कहा कि सरकार और एजेंसियां अक्सर किसानों पर तस्करी के आरोप लगाती हैं, जबकि असली कारण को नजरअंदाज कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि किसान शौक से बाहर नहीं बेचता, बल्कि मजबूरी में ऐसा करता है। अगर खेती में घाटा होगा, लागत नहीं निकलेगी और परिवार चलाना मुश्किल होगा तो किसान बेहतर दाम तलाशेगा। इसे तस्करी कहना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार खुद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अफीम की ऊंची कीमत की बात करती है, लेकिन किसान तक उसका लाभ नहीं पहुंचता। अगर किसानों को उनकी उपज का उचित हिस्सा मिल जाए तो कोई भी व्यक्ति बाहर मार्केट में बिक्री नहीं करेगा। जाट ने कहा कि वह इसकी गारंटी लेने को तैयार हैं कि उचित भुगतान होने पर किसान कानून तोड़ने की जरूरत ही महसूस नहीं करेगा। उसके बाद भी कोई बाहर बेचे तो उसके साथ-साथ मुझे भी सूली पर चढ़ा देना। बार-बार जांच और कार्रवाई से किसान परेशान बद्रीलाल जाट ने नारकोटिक्स विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसानों के खेतों में बार-बार माप, जांच और दूसरी कार्रवाई होती है। एक बार माप होने के बाद भी दोबारा-तिबारा माप किया जाता है और छोटे-छोटे अंतर के आधार पर किसानों को परेशान किया जाता है। उनका कहना है कि इससे किसानों में डर का माहौल रहता है। कई मामलों में परिवार के सदस्य भी कार्रवाई की चपेट में आ जाते हैं। उन्होंने कहा कि नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन ईमानदार किसानों को अपराधी की तरह देखना और बार-बार परेशान करना सही तरीका नहीं है। नीति नहीं बदली तो आंदोलन की चेतावनी जाट ने कहा कि इस बार अफीम नीति करीब 50 दिन देरी से जारी की गई। उनका आरोप है कि सरकार ने पंचायत चुनाव के दौरान विरोध से बचने के लिए ऐसा किया। उन्होंने कहा कि अगर किसानों को राहत नहीं मिली और मॉर्फिन की पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं की गई तो पंचायत चुनाव के बाद बड़ा आंदोलन होगा। उन्होंने 18 नवंबर को चित्तौड़गढ़ में धरना देने की चेतावनी भी दी। उनका कहना है कि किसानों की मांग बहुत बड़ी नहीं है। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उन्हें उनकी मेहनत का उचित दाम मिले, स्थायी और साफ अफीम नीति बने और उन्हें तस्कर की नजर से देखना बंद किया जाए। उनके अनुसार जब तक सरकार इस मूल समस्या को नहीं समझेगी, तब तक अफीम नीति को लेकर किसानों का विरोध जारी रहेगा। 18 नवंबर को ही बड़ा आंदोलन होगा, जिसमें पूरा चित्तौड़गढ़ जाम किया जाएगा।