राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पशुपालन विभाग द्वारा दायर एक विशेष अपील को खारिज करते हुए 10 साल से अधिक सेवा वाले कर्मचारियों की सेवा नियमित रखने के आदेश को बरकररा रखा। पशुपालन विभाग के डॉ. रमाकांत सोनी, डॉ. सुरेन्द्र कुमार और डॉ. शादाब अहमद खान सहित अन्य पशु चिकित्सा अधिकारियों को वर्ष 2013 में विज्ञापित पदों के तहत निर्धारित चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त किया गया था। हालांकि, विभाग ने लगभग तीन साल बाद अचानक उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं। इसके खिलाफ कर्मचारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिली और वे लगातार अपनी सेवाएं देते रहे। इसके बाद एकल पीठ ने 28 नवंबर 2025 को याचिका को स्वीकार करते हुए उनकी सेवाएं नियमित करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा- जिन कर्मचारियों ने शुरुआती नियुक्तियों में तकनीकी या प्रक्रियागत कमियों के बावजूद 10 साल या उससे अधिक की निरंतर सेवा पूरी कर ली है, वे नियमितीकरण के पूर्ण हकदार हैं हाईकोर्ट की खंडपीठ में राज्य सरकार ने दायर की थी अपील एकल पीठ के इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर की गई थी। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया और चर्चित फैसलों विशेषकर 'जग्गो बनाम भारत संघ' (2024) और 'विनोद कुमार' मामले का हवाला देते हुए सरकार के सभी तर्कों को खारिज कर दिया। केवल अस्थायी जैसे शब्दों के आधार पर अधिकार नहीं छीना जा सकता कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केवल 'अस्थायी' या 'तदर्थ' जैसे शुरुआती शब्दों के आधार पर लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के वैध अधिकारों को छीना नहीं जा सकता। खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि बार-बार सेवाएं समाप्त करना वास्तव में कर्मचारियों को नियमितीकरण और उसके वित्तीय लाभों से वंचित करने का एक प्रशासनिक तरीका मात्र है। कोर्ट ने यह माना कि यदि कोई कर्मचारी स्वीकृत पदों के विरुद्ध लगातार एक दशक से अधिक समय से बिना किसी प्रशासनिक शिकायत के संतोषजनक सेवाएं दे रहा है, तो प्रक्रियागत औपचारिकताओं को आड़ बनाकर उसे अनिश्चितता में नहीं रखा जा सकता। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने एकल पीठ के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की विशेष अपील को खारिज कर दिया है।