भारत-पाक सीमा से सटा तामलोर गांव। वर्ष 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान यहां के ग्रामीण सेना के साथ खड़े रहे। रेगिस्तानी इलाका होने से दुर्गम इलाके में रास्ता दिखाने से लेकर उनके लिए खाने-पीने की खाद्य सामग्री भी अपने घरों से बनाकर पहुंचाते थे। इसी से खुश होने के बाद सेना के सहयोग से तामलोर की पथरीली जमीन को खोद तालाब बनाया था। इस तालाब से सालभर लोग पानी पीते हैं। सेना ने सिंध प्रांत के छाछरों तक कब्जा कर लिया था। वर्ष 1965 के दौर में सीमावर्ती गांव तामलोर के धोरों में दूर-दूर तक पानी का इंतजाम नहीं था। ग्रामीण ऊंटों पर पखाल भरकर पानी लाते थे। पथरीली जमीन होने से वहां तालाब की खुदाई करना मुश्किल था। तालाब बनने के बाद 60 साल से हजारों ग्रामीण और मवेशी इस तालाब से मीठा पानी पी रहे हैं। मानसून की एक बारिश में तालाब भरने से सालभर पानी पीते हैं। सरपंच हिंदूसिंह तामलोर का कहना है कि पूर्व में ग्रामीण इलाकों में पानी के इंतजाम नहीं थे, तब सेना की मदद से तालाब खोदा था। अब तो जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल मीठा पानी आ रहा है। विकास कार्यों की राज्यपाल भी सराहना कर चुके: तामलोर ऐसा गांव है, जो भारत-पाक बॉर्डर से सटा हुआ है। यहां गांव में हर घर तक मीठे पानी के कनेक्शन 2023 में ही हो गए थे। नर्मदा नहर का मीठा पानी नल से लोगों के घरों तक पहुंच रहा है। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े भी निरीक्षण कर चुके है और विकास कार्यों की सराहना की थी। गांव में एक उप स्वास्थ्य केंद्र, सैकंडरी स्कूल, प्राइमरी स्कूल, पोस्ट ऑफिस, आंगनबाड़ी केंद्र, ग्राम सेवा सहकारी समिति है। इसके अलावा पिछले 5 सालों में करीब 250 पीएम आवास बने हैं। इसके अलावा सार्वजनिक सभा भवन, वाचनालय, सांस्कृतिक कला केंद्र, चार दीवारी व अन्य काम करवाए गए है। 20 लाख रुपए से सैकंडरी स्कूल में कम्प्यूटर कक्ष निर्माण करवाया गया है। इसके अलावा 5-5 करोड़ से रेलवे क्रॉसिंग पर अंडरपास बनाए गए। इससे लोगों का आवागमन आसान हुआ है। पंचायत का लेखा-जोखा जनसंख्या :3500 साक्षरता दर : 65 % मुख्यालय से दूरी : 100 किमी कनेक्टिविटी : गडरारोड-मुनाबाव हाइवे। पहचान : प्रसिद्ध तालाब