कभी रिश्तों की हंसी पर ठहाके लगे तो कभी प्रेम की संवेदनाओं ने दिल छुआ। वीर रस की कविताओं ने देशभक्ति का जज्बा जगाया तो मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास ने श्रोताओं को गर्व से भर दिया। उदयपुर नगर निगम के दीपावली मेले में मंगलवार की रात को आयोजित कवि सम्मेलन में कविता के ऐसे ही विविध रंग देखने को मिले। टाउनहॉल प्रांगण में देश के ख्यातनाम कवियों ने अपनी रचनाओं से ऐसा समां बांधा कि श्रोता गुलाबी ठंड के बीच देर रात तक जमे रहे। ठहाकों से गूंजा पंडाल कवि सम्मेलन में प्रसिद्ध कवि शैलेश लोढ़ा रहे। उनके मंच पर आते ही तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत हुआ। अपने चिर-परिचित अंदाज में उन्होंने हास्य और व्यंग्य की ऐसी फुलझड़ियां छोड़ीं कि पांडाल बार-बार ठहाकों से गूंज उठा। अपनी रचनाओं में संस्कृति, इतिहास और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े प्रसंगों को रोचक अंदाज में प्रस्तुत कर उन्होंने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा। शैलेश लोढ़ा ने अपनी कविता के माध्यम से बच्चों के बचपन और उनकी मासूमियत को बचाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने अपनी रचना "मैं बच्चे ढूंढ रहा हूं, जो बच्चे हों... इन बच्चों को सिर्फ बच्चे रहने दो।" उनकी इस रचना ने श्रोताओं को हंसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर किया। कविता के जरिए उन्होंने बच्चों पर समय से पहले बड़ों जैसी अपेक्षाओं का बोझ डालने के बजाय उन्हें खुलकर बचपन जीने देने की बात कही। लोढ़ा ने समाज तक यह बात पहुंचाने की कोशिश करते हुए कहा कि मोबाइल को छोड़कर घर में है तो परिवार के साथ बैंठे और समय दें। पहले तस्वीरें देखें…. कवि डॉ. विष्णु सक्सेना ने प्रेम और रिश्तों की गहराई को अपनी भावपूर्ण रचनाओं में पिरोया। उन्होंने कहा, जो हाथ थाम लो वो फिर न छूटने पाए, प्यार की दौलतें कोई न लूटने पाए। जब भी छुओ बुलंदियां तो ध्यान ये रखना, जमीं से पांव का रिश्ता न टूटने पाए। उनकी इन पंक्तियों पर श्रोताओं ने खूब दाद दी। उन्होंने बेटियों के महत्व और समाज में उनके सम्मान को भी अपनी कविताओं के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। दौसा के कवि संजय झाला ने पारिवारिक रिश्तों की अहमियत को हास्य के अंदाज में बयां किया। उन्होंने कहा कि भाई की हंसी ताकत सवाई है, बहन की हंसी मजबूत कलाई है, पिता की हंसी बच्चों की कमाई है, मां की हंसी प्रभु की प्रभुताई है, बच्चों की हंसी पीर की भुलाई है, बेटी की हंसी बाप की दवाई है...। रिश्तों की खूबसूरती और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी इन पंक्तियों पर श्रोताओं ने जमकर ठहाके लगाए। लखनऊ की कवयित्री शशि श्रेया ने श्रृंगार रस की रचनाओं से काव्य सम्मेलन में प्रेम और संवेदनाओं का रंग घोला। उन्होंने कहा, रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर, कुछ बचेगा नहीं। तुमने पत्थर का दिल हमको कह तो दिया, पत्थरों पर लिखोगे, मिटेगा नहीं। उनकी इन पंक्तियों ने श्रोताओं को भावनाओं के अलग-अलग रंगों से रूबरू कराया और खूब तालियां बटोरीं।
कोटा के वीर रस के कवि जगदीश सोलंकी ने सैनिकों के अदम्य साहस और मां की ममता को शब्दों में पिरोते हुए कहा, मां तेरी दुआ के दम से, आंचल की हवा के हृदय से, बर्फीली चट्टानों पर बारूद को उगाया है। परिंदा भी जहां पर नहीं मार सके, उस जगह जाकर भी तिरंगा फहराया है। इन ओजस्वी पंक्तियों ने पांडाल में देशभक्ति का माहौल बना दिया। श्रोता अपनी जगह खड़े होकर भारत माता की जय के उद्घोष करने लगे। उदयपुर के कवि राव अजातशत्रु ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास, वीरता और स्वाभिमान की गाथा को जीवंत किया। मेवाड़ की अस्मिता और वीरांगना पद्मिनी के जौहर की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने ओजपूर्ण काव्य पाठ किया। उनकी रचनाओं ने श्रोताओं में मेवाड़ी होने का गर्व और गौरव का भाव भर दिया।
नई दिल्ली के हास्य कवि चेतन चर्चित ने जीवन की चुनौतियों और सकारात्मक सोच को अपनी कविता में पिरोते हुए कहा, हर महफिल में हंसते गाते रहना है, हमको अपना दर्द छुपाते रहना है। अंधियारे के पांव नहीं टिकने देना, सबके दर पे दीप जलाते रहना है। हास्य और संदेश से भरी इन पंक्तियों पर श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं। मेयर सिंघवी कुर्सी छोड़ जमीन पर बैठे कवि सम्मेलन में मेयर पारस सिंघवी ने कुर्सी छोड़कर आगे ही आगे मंच के नीचे की तरफ जमीन पर बैठे। वे दर्शकों के बीच बैठकर कवियों की काव्य पाठ पर तालियां बजाई। दीपावली मेला संयोजक प्रमोद सामर ने स्वागत किया।